Whether government of Yogi Aditya Nath will take action on the corruption of L.D.A.?

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  संदर्भ संख्या : 60000210036255 , दिनांक - 24 Feb 2021 तक की स्थिति आवेदनकर्ता का विवरण : शिकायत संख्या :- 60000210036255 आवेदक का नाम - Yogi M P Singh विषय - An application under Article 51 A of the constitution of India. संदर्भ संख्या : 60000210010604 , दिनांक – 13 Feb 2021 तक की स्थिति आवेदनकर्ता का विवरण : शिकायत संख्या :-60000210010604 आवेदक का नाम - Yogi M P Singh In the aforementioned matter, an arbitrary report submitted by the public authority Lucknow Development Authority even when the matter concerns the deep rooted corruption. Detail attached to grievance to take appropriate action in the matter as requires under the law. If necessary contact me on my my mobile number-7379105911. Please adopt cogent approach in the matter. प्रकरण का सम्बन्ध उ 0 प्र 0 सरकार से नहीं है महोदय यह शब्द और वाक्य यह बता रहे है की उत्तर प्रदेश में कानून का राज्य नहीं है क्यों की हर नौकरशाह अपने आप की नौकर तो समझता ही नहीं है

Yogi Shiva Raksha Stotram was taught by Lord Narayan to Saint Yagyvalkya


Our motive is to spread religious sentiments in the society and lessen the jealousy and enhance universal brother hood among people. I am a crusader against growing corruption in the system.

श्रीशिवरक्षास्तोत्रम्

श्री गणेशाय नमः ॥

अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः ॥

श्री सदाशिवो देवता ॥ अनुष्टुप् छन्दः ॥

श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥

चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।

अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ॥ १॥

गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।

शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः ॥ २॥

गंगाधरः शिरः पातु भालं अर्धेन्दुशेखरः ।

नयने मदनध्वंसी कर्णो सर्पविभूषण ॥ ३॥

घ्राणं पातु पुरारातिः मुखं पातु जगत्पतिः ।

जिह्वां वागीश्वरः पातु कंधरां शितिकंधरः ॥ ४॥

श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः ।

भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक् ॥ ५॥

हृदयं शंकरः पातु जठरं गिरिजापतिः ।

नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बरः ॥ ६॥

सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः ॥

उरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः ॥ ७॥

जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ॥

चरणौ करुणासिंधुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ॥ ८॥

एतां शिवबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।

स भुक्त्वा सकलान्कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ९॥

ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये ।

दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात् ॥ १० ॥

अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।

भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम् ॥ ११॥

इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽऽदिशत् ।

प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यः तथाऽलिखत् ॥ १२॥

इति श्रीयाज्ञवल्क्यप्रोक्तं शिवरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ 

 

Comments

  1. इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽऽदिशत् ।

    प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यः तथाऽलिखत् ॥
    Which means Lord Narayan discoursed these verses to Saint Yagyavalkya and when saint got up next day, he compiled these verses as Shiva Raksha Stotra.

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